Saturday, September 4, 2010

सोचूं मैं यह बैठे नदिया किनारे (Sochun Main Yeh Baithe Nadiya Kinaare)


समय के लय में मैंने कुछ सपने बुने थे
ख्वाहिशों के उड़ान में कुछ नगमे सुने थे

जाने कहा खो गए हैं सारे
सोचूं मै यह बैठे नदिया किनारे

तुतलाती बोली से बनाया था अपना भविष्य
बचपन की कहानियों में था कितना कशिश 

कभी डॉक्टर तो कभी टीचर बनना था
और कभी खिलौने वाले जहाज़ पे आसमान में उड़ना था

समय के साथ सब बदल गया
कामयाबी की चाह में पूरा बचपन जल गया

कहाँ खो गए है वो सपने सारे
सोचूं मैं यह बैठे नदिया किनारे

ज़िंदगी की उधेड़ बुन (Zindagi Ki Udhedd Bun)

ज़िंदगी की उधेड़ बुन में ग़ुम से गए हैं मेरे सपने
आगे निकलने की होड़ में छुट गए हैं मुझसे मेरे अपने

फासले अब दायरे में बदल गए
वक़्त से पहले ही दिन ढल गए
 
किताबों के पन्नो में ढूंढ़ रही थी जिसे
हाथों की लकीरों से वो भी धुल गए
चली थी आस्मा को छूने और संसार के सारे मायने बदल गए