ज़िंदगी की उधेड़ बुन में ग़ुम से गए हैं मेरे सपने
आगे निकलने की होड़ में छुट गए हैं मुझसे मेरे अपने
फासले अब दायरे में बदल गए
वक़्त से पहले ही दिन ढल गए
किताबों के पन्नो में ढूंढ़ रही थी जिसे
हाथों की लकीरों से वो भी धुल गए
चली थी आस्मा को छूने और संसार के सारे मायने बदल गए
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